सूडान के गृहयुद्ध में आम जनता की मौत का सिलसिला आखिर कब थमेगा

सूडान के गृहयुद्ध में आम जनता की मौत का सिलसिला आखिर कब थमेगा

सूडान में आसमान से बरसती मौत ने एक बार फिर दुनिया को झकझोर दिया है। सेना ने जो एयरस्ट्राइक की उसमें 56 लोगों की जान चली गई और 107 से ज्यादा लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। ये महज आंकड़े नहीं हैं। ये वो परिवार हैं जो दो जनरल की सत्ता की भूख के बीच पिस रहे हैं। अगर आप सोच रहे हैं कि ये हमला सिर्फ आतंकियों या विद्रोहियों पर था, तो आप गलत हैं। हकीकत ये है कि सूडान की गलियां अब कब्रिस्तान बन चुकी हैं और वहां रहने वाले आम शहरी इस खूनी खेल के सबसे बड़े शिकार हैं।

सूडान की सेना (SAF) और अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (RSF) के बीच चल रही ये जंग अब उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां मानवीय संवेदनाओं की कोई जगह नहीं बची। ये हमला खार्तूम और उसके आसपास के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाकर किया गया। सेना का दावा है कि वे आरएसएफ के ठिकानों को तबाह कर रहे थे। लेकिन क्या रिहायशी इलाकों में बम गिराना जायज है?

सूडान की बर्बादी के पीछे की असली कहानी

सूडान में जो हो रहा है वो अचानक नहीं हुआ। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। अप्रैल 2023 से शुरू हुआ ये संघर्ष अब एक पूर्ण गृहयुद्ध का रूप ले चुका है। जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान, जो सूडान की सेना के प्रमुख हैं, और मोहम्मद हमदान डागालो (हेमेती), जो आरएसएफ के कमांडर हैं, के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने पूरे देश को खंडहर बना दिया है।

पहले ये दोनों साथ थे। इन्होंने मिलकर 2021 में तख्तापलट किया था। लेकिन जब सत्ता के बंटवारे और आरएसएफ को सेना में शामिल करने की बात आई, तो दोनों के रास्ते अलग हो गए। अब आलम ये है कि दोनों पक्ष अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ताक पर रखकर एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं। इस ताजा एयरस्ट्राइक ने साबित कर दिया कि सेना अब हताशा में रिहायशी इलाकों को भी नहीं बख्श रही है।

एयरस्ट्राइक का खौफनाक मंजर और जमीनी हकीकत

जब आसमान से बम गिरे, तो बाजार में लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए निकले थे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि धमाके इतने तेज थे कि कई इमारतों के परखच्चे उड़ गए। 56 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, लेकिन स्थानीय सूत्रों का मानना है कि ये संख्या बढ़ सकती है। अस्पतालों की हालत खराब है। वहां न दवाइयां हैं और न ही पर्याप्त डॉक्टर।

सूडान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, घायल हुए 107 लोगों में से कई की हालत नाजुक है। सूडान के डॉक्टर्स यूनियन ने चेतावनी दी है कि अगर तत्काल चिकित्सा सहायता नहीं मिली, तो मरने वालों का आंकड़ा सौ के पार जा सकता है। बिजली और पानी की सप्लाई पहले ही ठप है। ऐसे में घायलों का इलाज करना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और विफलता

दुनिया का ध्यान इस वक्त यूक्रेन और गाजा पर है। सूडान जैसे देशों की त्रासदी अक्सर खबरों के नीचे दब जाती है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने कई बार युद्धविराम की अपील की है। अफ्रीकी संघ ने भी कोशिशें कीं। पर नतीजा क्या निकला? शून्य।

हथियारों की सप्लाई रुक नहीं रही है। पड़ोसी देश अपने हितों के लिए किसी न किसी पक्ष का समर्थन कर रहे हैं। जब तक बाहरी ताकतें सूडान में दखल देना बंद नहीं करेंगी, ये खून-खराबा नहीं रुकेगा। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट बताती है कि इस युद्ध में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और लाखों लोग विस्थापित होकर पड़ोसी देशों में शरण लेने को मजबूर हैं।

मानवीय संकट की भयावह तस्वीर

सूडान में आज जो हो रहा है उसे "दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन संकट" कहा जा रहा है।

  • खाने की कमी के कारण भुखमरी का खतरा बढ़ गया है।
  • बच्चों को जबरन युद्ध में झोंका जा रहा है।
  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा की खबरें रोज आ रही हैं।
  • स्कूल और कॉलेज महीनों से बंद हैं।

ये सिर्फ एक देश की बर्बादी नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का खत्म होना है।

क्या वाकई कोई समाधान मुमकिन है

ईमानदारी से कहूं तो फिलहाल शांति की उम्मीद कम ही दिखती है। दोनों जनरलों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। सेना को लगता है कि वो हवाई हमलों से आरएसएफ को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगी। वहीं आरएसएफ ने जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रखी है और वो छापामार युद्ध (Guerrilla warfare) के जरिए सेना को चुनौती दे रही है।

अगर सूडान को बचाना है, तो सबसे पहले उन देशों पर प्रतिबंध लगाने होंगे जो इन दोनों गुटों को हथियारों की सप्लाई कर रहे हैं। सिर्फ निंदा करने से बम गिरना बंद नहीं होंगे। सूडान की जनता को लोकतंत्र चाहिए था, लेकिन उन्हें मिला बारूद और खून।

इस एयरस्ट्राइक के बाद सूडान की सड़कों पर अब सिर्फ मातम है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया को इस मुद्दे पर और मुखर होना होगा। जब तक दबाव नहीं बनेगा, ये जनरल अपनी जिद के लिए मासूमों की जान लेते रहेंगे। अगर आप दुनिया की राजनीति को करीब से देखते हैं, तो आपको पता होगा कि बिना ठोस कार्रवाई के ऐसे संघर्ष सालों साल चलते हैं। सूडान के मामले में भी यही हो रहा है।

सूडान की इस स्थिति पर नजर रखना और वहां की आवाम की आवाज बनना ही फिलहाल एकमात्र रास्ता है। आपको समझना होगा कि ये सिर्फ दो सेनाओं की जंग नहीं है, ये मानवता के खिलाफ अपराध है। सूडान को इस वक्त सहानुभूति की नहीं, बल्कि सख्त अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की जरूरत है जो इस खूनी खेल को स्थायी रूप से रोक सके। वहां के अस्पतालों को तुरंत मेडिकल सप्लाई और भोजन की आवश्यकता है ताकि जो जिंदा बचे हैं, उन्हें बचाया जा सके।

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Amelia Miller

Amelia Miller has built a reputation for clear, engaging writing that transforms complex subjects into stories readers can connect with and understand.