बेंजामिन नेतन्याहू ने फिर साबित कर दिया कि वो वादों से ज्यादा बारूद पर भरोसा करते हैं। डोनाल्ड ट्रंप की तथाकथित 'शांति योजना' की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि इजरायली लड़ाकू विमानों ने दक्षिणी लेबनान को खंडहर बना दिया। लेबनान का आखिरी संपर्क पुल अब मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। ये महज एक सैन्य कार्रवाई नहीं है। ये ट्रंप के चेहरे पर एक राजनीतिक तमाचा है। जब पूरी दुनिया युद्ध विराम की उम्मीद कर रही थी, तब 254 लाशें बिछ गईं। 12 लाख लोग बेघर होकर सड़कों पर हैं।
इसे आप 'ऑपरेशन' नहीं कह सकते। ये सीधे तौर पर एक मानवीय आपदा है। इजरायल का दावा है कि वो हिजबुल्लाह को खत्म कर रहा है, लेकिन हकीकत में वो लेबनान की रीढ़ तोड़ रहा है। आखिरी पुल का गिरना बताता है कि नेतन्याहू का मकसद सिर्फ सीमा सुरक्षित करना नहीं है। वो लेबनान को दशकों पीछे धकेलना चाहते हैं।
ट्रंप की शांति और इजरायली बमों का विरोधाभास
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी 'मैक पीस' पॉलिसी का ढोल पीट रहे हैं। उनके समर्थक इसे सदी का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक बता रहे थे। लेकिन नेतन्याहू ने इस नैरेटिव की धज्जियां उड़ा दीं। ट्रंप की टीम ने दावा किया था कि इजरायल अब रुक जाएगा। हकीकत आपके सामने है। इजरायली सेना ने ठीक उसी वक्त हमले तेज किए जब वॉशिंगटन में शांति की मेज सज रही थी।
ये समझना मुश्किल नहीं है कि नेतन्याहू ऐसा क्यों कर रहे हैं। उन्हें पता है कि ट्रंप के आने से उन्हें एक लंबी छूट मिल सकती है, लेकिन वो उस छूट का इंतजार नहीं करना चाहते। वो अपनी शर्तों पर खेल खत्म करना चाहते हैं। ट्रंप शांति की बात करते हैं और नेतन्याहू बमबारी की। ये विरोधाभास मिडिल ईस्ट को एक ऐसी आग में झोंक रहा है जिसे बुझाना नामुमकिन होगा। लेबनान के आखिरी पुल का टूटना प्रतीकात्मक है। ये शांति की आखिरी उम्मीद के टूटने जैसा है।
254 मौतें और मलबे में दबा लेबनान का भविष्य
आंकड़े डराने वाले हैं। सिर्फ पिछले 48 घंटों में 254 लोगों की जान चली गई। इनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। क्या ये सब हिजबुल्लाह के लड़ाके थे? बिल्कुल नहीं। इजरायली खुफिया तंत्र की चूक कहें या जानबूझकर की गई क्रूरता, सिविलियन इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है। दक्षिणी लेबनान के टायर और नबातीह जैसे शहर अब भूतों के शहर बन चुके हैं।
जब 12 लाख लोग अपना घर छोड़ते हैं, तो वो सिर्फ विस्थापित नहीं होते। वो एक पूरी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। बेरूत की गलियों में सो रहे परिवार, खाने की किल्लत और अस्पतालों में दवाओं का अभाव—ये लेबनान का नया सच है। नेतन्याहू इसे 'सुरक्षा घेरा' कह सकते हैं, लेकिन दुनिया इसे नरसंहार की तरह देख रही है। इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) ने बेरूत के बाहरी इलाकों में जिस तरह से हवाई हमले किए हैं, वो साफ दिखाते हैं कि अब कोई भी रेड लाइन नहीं बची है।
क्या हिजबुल्लाह खत्म हो रहा है
ये सबसे बड़ा सवाल है। इजरायल कहता है कि उसने हिजबुल्लाह के बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है। मगर इतिहास गवाह है कि बमबारी से विचारधाराएं खत्म नहीं होतीं। बल्कि, मलबे के नीचे से अक्सर और ज्यादा कट्टर नफरत पैदा होती है। हिजबुल्लाह के पास अभी भी लंबी दूरी की मिसाइलें हैं। वो इजरायल के उत्तरी शहरों पर लगातार हमले कर रहा है। नेतन्याहू की ये आक्रामकता इजरायली नागरिकों को भी खतरे में डाल रही है। हाइफा और तेल अवीव के सायरन इस बात का सबूत हैं।
लेबनान का आखिरी पुल और रसद की घेराबंदी
इजरायल ने लेबनान के आखिरी प्रमुख पुल को क्यों उड़ाया? इसका जवाब सैन्य रणनीति में छिपा है। ये पुल न केवल रसद पहुंचाने का जरिया था, बल्कि घायलों को निकालने का एकमात्र रास्ता भी था। इसे तबाह करके इजरायल ने पूरे इलाके को एक 'किलिंग जोन' में बदल दिया है। न कोई बाहर जा सकता है, न कोई मदद अंदर आ सकती है।
इसे 'सीज' (Siege) कहना गलत नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन नेतन्याहू को अंतरराष्ट्रीय कानूनों की परवाह कभी नहीं रही। उन्हें सिर्फ अपनी सत्ता बचानी है। इजरायल के अंदर उन पर भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं और युद्ध ही उनका एकमात्र सुरक्षा कवच है। जब तक जंग जारी है, उनकी कुर्सी सुरक्षित है।
ट्रंप की वापसी और इजरायल की खुली छूट
डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि वो जंग रुकवा देंगे। अब वो सत्ता में हैं। लोग पूछ रहे हैं कि वो चुप क्यों हैं? क्या ट्रंप की शांति सिर्फ कागजों तक सीमित है? सच तो ये है कि ट्रंप का 'अमेरिका फर्स्ट' इजरायल को 'ब्लैंक चेक' देने जैसा है। नेतन्याहू को पता है कि ओबामा या बाइडन की तरह ट्रंप उन पर मानवाधिकारों का दबाव नहीं डालेंगे।
ये एक खतरनाक साठगांठ है। ट्रंप को अपनी इमेज सुधारनी है और नेतन्याहू को अपनी सत्ता। इस खेल में लेबनान के आम नागरिक सिर्फ मोहरे बन कर रह गए हैं। 12 लाख बेघर लोगों का दर्द वॉशिंगटन के आलीशान कमरों तक नहीं पहुंच रहा।
मिडिल ईस्ट में नए युद्ध की आहट
ये जंग अब सिर्फ इजरायल और लेबनान के बीच नहीं रही। ईरान इस पर पैनी नजर रखे हुए है। अगर इजरायल ने अपनी सीमाएं और लांघी, तो तेहरान खामोश नहीं बैठेगा। हमने देखा है कि कैसे ईरान समर्थित गुटों ने लाल सागर और सीरिया में मोर्चा खोल दिया है। ये एक क्षेत्रीय युद्ध का शुरुआती चरण हो सकता है। लेबनान के आखिरी पुल का गिरना उस चिंगारी जैसा है जो बारूद के ढेर को उड़ा सकती है।
क्या वाकई कोई रास्ता बचा है
ईमानदारी से कहूं तो फिलहाल शांति दूर की कौड़ी लगती है। जब तक नेतन्याहू सत्ता में हैं और उन्हें अमेरिकी हथियारों की सप्लाई मिल रही है, बमबारी नहीं रुकेगी। लेबनान की सरकार पंगु हो चुकी है। वहां की अर्थव्यवस्था पहले ही वेंटिलेटर पर थी, अब ये हमले उसे पूरी तरह दफन कर देंगे।
अगर आप इस स्थिति को समझना चाहते हैं, तो इन तीन बिंदुओं पर नजर रखें:
- ट्रंप का अगला बड़ा बयान: क्या वो नेतन्याहू को वाकई फोन करके रुकने को कहेंगे?
- ईरान का पलटवार: क्या हिजबुल्लाह को नई पीढ़ी की मिसाइलें मिलेंगी?
- इजरायल के अंदर विरोध: क्या इजरायली जनता अपने सैनिकों की मौतों के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सड़कों पर उतरेगी?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू ये है कि हम 2026 में जी रहे हैं, लेकिन हमारी मानसिकता पाषाण युग जैसी है। ताकतवर कमज़ोर को कुचल रहा है और दुनिया तमाशा देख रही है। लेबनान के मलबे से निकलने वाली चीखें ट्रंप की शांति योजना पर सबसे बड़ा सवालिया निशान हैं।
अभी के हालात में आपको अपनी सुरक्षा और जानकारी के लिए तैयार रहना चाहिए। मिडिल ईस्ट में रहने वाले भारतीयों या वहां व्यापार करने वालों के लिए ये वक्त बेहद संवेदनशील है। अपनी यात्राओं को टालें और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के बजाय सीधे जमीनी रिपोर्ट्स पर भरोसा करें। शांति की उम्मीद जरूर रखें, लेकिन हकीकत से आंखें न मूंदें। नेतन्याहू के इस प्रहार ने लेबनान ही नहीं, पूरी दुनिया के सुकून को हिला कर रख दिया है।