लेबनान सीमा पर ड्रोन वॉरफेयर का सच: मीडिया जिसे हिज़बुल्लाह की जीत बता रहा है वह असल में एक रणनीतिक विफलता है

लेबनान सीमा पर ड्रोन वॉरफेयर का सच: मीडिया जिसे हिज़बुल्लाह की जीत बता रहा है वह असल में एक रणनीतिक विफलता है

मुख्यधारा का मीडिया फिर से उसी पुराने ढर्रे पर लौट आया है। हैडलाइन छपती है: "हिज़बुल्लाह ने लेबनान में इज़रायली सेना को बनाया निशाना, ड्रोन्स से किया हमला।" खबरें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव हो गया हो। ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे सस्ते, रेडीमेड ड्रोन्स ने दुनिया की सबसे आधुनिक सेनाओं में से एक को घुटनों पर ला दिया है।

यह केवल सतही पत्रकारिता नहीं है। यह सैन्य रणनीति की बुनियादी समझ की विफलता है।

तथ्य यह है कि हिज़बुल्लाह के ये हालिया ड्रोन हमले कोई मास्टरस्ट्रोक नहीं हैं। ये उनके हताश होने का सबूत हैं। जब आप गहराई से इस संघर्ष के सैन्य डेटा और परिचालन इतिहास (operational history) को देखते हैं, तो समझ आता है कि मीडिया जिसे "सफल हमला" कहकर सनसनी फैला रहा है, वह असल में हिज़बुल्लाह की बढ़ती सैन्य लाचारी को छुपाने का एक जरिया मात्र है।

हेडलाइंस का भ्रम बनाम ग्राउंड रियलिटी

सैन्य विश्लेषक अक्सर एक साधारण नियम भूल जाते हैं: नुकसान पहुंचाने और रणनीतिक लक्ष्य हासिल करने में जमीन-आसमान का अंतर होता है। इज़रायली सेना (IDF) की उत्तरी कमान के ठिकानों पर कुछ क्वाडकॉप्टर्स या सुसाइड ड्रोन्स से हमला कर देना हेडलाइंस के लिए तो अच्छा है, लेकिन इससे युद्ध का नक्शा नहीं बदलता।

मैंने सालों तक मिडिल ईस्ट के रक्षा समीकरणों और एसिमेट्रिक वॉरफेयर (असममित युद्ध) का विश्लेषण किया है। जब कोई उग्रवादी संगठन पारंपरिक मिसाइल हमलों से हटकर छोटे ड्रोन्स पर पूरी तरह निर्भर होने लगता है, तो इसका सीधा मतलब होता है कि उसकी भारी आक्रामक क्षमताएं या तो नष्ट कर दी गई हैं या उन्हें पंगु बना दिया गया है।

कल्पना कीजिए कि एक बॉक्सर जिसके पास कभी नॉकआउट पंच मारने की ताकत थी, अब वह केवल अपने प्रतिद्वंद्वी को बार-बार हल्के से थपथपा रहा है ताकि वह रिंग में टिका हुआ दिखे। हिज़बुल्लाह के ड्रोन हमले ठीक वही थपथपाहट हैं।

आयरन डोम की 'नाकामी' का असली सच

अक्सर सवाल उठाया जाता है: "अगर इज़राइल का एयर डिफेंस इतना मजबूत है, तो ये ड्रोन सीमा पार कैसे कर जाते हैं?"

यह सवाल ही गलत धारणा पर आधारित है। कोई भी वायु रक्षा प्रणाली शत-प्रतिशत अभेद्य नहीं होती। आयरन डोम और डेविड्स स्लिंग जैसी प्रणालियों को बैलिस्टिक मिसाइलों, रॉकेट्स और बड़े यूएवी (UAVs) को इंटरसेप्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। जब आप कम ऊंचाई पर उड़ने वाले, धीमी गति के और फाइबर-प्लास्टिक से बने छोटे ड्रोन्स का इस्तेमाल करते हैं, तो वे रडार की नजरों से बचकर निकल सकते हैं।

लेकिन यहाँ ट्विस्ट है: इन ड्रोन्स की पेलोड क्षमता (विस्फोटक ले जाने की क्षमता) इतनी कम होती है कि इनसे होने वाला नुकसान रणनीतिक रूप से नगण्य होता है। एक या दो गैरीसन चौकियों की दीवारों पर खरोंच आने या कुछ वाहनों के क्षतिग्रस्त होने से युद्ध की दिशा नहीं बदलती। हिज़बुल्लाह अपनी मिसाइल यूनिट्स पर इज़रायली हवाई हमलों के बाद अब इसी कम-लागत, कम-असर वाली रणनीति को अपनी सफलता बताकर अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहा है।


प्रोपेगैंडा बनाम सैन्य प्रभावशीलता

इस तथाकथित ड्रोन युद्ध के पीछे असली खेल सैन्य नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक है। हिज़बुल्लाह अच्छी तरह जानता है कि वह लेबनान के मोर्चे पर पारंपरिक युद्ध में इज़राइल को पीछे नहीं धकेल सकता। इसलिए, उसका पूरा ध्यान "इमेज मैनेजमेंट" पर है।

  • वीडियो फुटेज की राजनीति: हर हमले का एक वीडियो बनाया जाता है, जिसे सोशल मीडिया पर वायरल किया जाता है। इसका मकसद लेबनान के अंदर अपनी गिरती लोकप्रियता को संभालना और अपने समर्थकों को यह दिखाना है कि वे अब भी लड़ रहे हैं।
  • असममित युद्ध की सीमाएं: असममित युद्ध (Asymmetric Warfare) तब तक प्रभावी होता है जब तक आप दुश्मन को चौंकाते हैं। जब इज़राइल ने अपने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) जैमर्स को पूरी उत्तरी सीमा पर सक्रिय कर दिया है, तब हिज़बुल्लाह के आधे से ज्यादा ड्रोन अपने लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही समुद्र में या खाली खेतों में गिर रहे हैं। मीडिया इन गिरे हुए ड्रोन्स की गिनती कभी नहीं दिखाता।

इस रणनीति का सबसे बड़ा नुकसान खुद हिज़बुल्लाह को हो रहा है। इन छोटे हमलों के जवाब में इज़राइल को लेबनान के भीतर हिज़बुल्लाह के शीर्ष कमांडरों और उनकी वास्तविक मिसाइल डिपो को निशाना बनाने का वैध बहाना मिल जाता है। यह एक ऐसा सौदा है जिसमें हिज़बुल्लाह हर बार घाटे में रहता है।

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वह सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा

लोग अक्सर पूछते हैं: "क्या हिज़बुल्लाह के पास इज़राइल को बड़ा नुकसान पहुंचाने की क्षमता खत्म हो गई है?"

यह पूछने के बजाय कि क्या क्षमता खत्म हो गई है, हमें यह पूछना चाहिए: "क्या हिज़बुल्लाह अब केवल ईरान के भू-राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए खुद को दांव पर लगा रहा है?"

बिल्कुल सही। हिज़बुल्लाह का स्वायत्त वजूद अब एक मिथक बन चुका है। उनके ड्रोन हमले इज़राइल को रोकने के लिए नहीं हैं; वे केवल तेहरान को यह दिखाने के लिए हैं कि लेबनान के मोर्चे पर हलचल जारी है। जब आप अपनी रणनीति किसी बाहरी देश के इशारे पर तय करते हैं, तो आप सैन्य रूप से कभी नहीं जीत सकते।

इस रणनीति का एक और स्याह पहलू है। छोटे ड्रोन हमलों से इज़राइल की सेना को अपनी कमियों को सुधारने का मौका मिल रहा है। इसे सैन्य भाषा में 'लाइव-फायर टेस्टिंग' कहते हैं। हिज़बुल्लाह जितने अधिक ड्रोन भेजेगा, इज़राइल का एआई-संचालित एंटी-ड्रोन सिस्टम (जैसे 'ड्रोन डोम') उतना ही अधिक सटीक और घातक होता जाएगा। हिज़बुल्लाह अनजाने में अपने ही दुश्मन को भविष्य के युद्ध के लिए प्रशिक्षित कर रहा है।

युद्ध कभी भी केवल इस बात से नहीं जीता जाता कि किसने कितने ड्रोन उड़ाए। युद्ध इस बात से जीता जाता है कि किसने दुश्मन की लड़ने की इच्छाशक्ति और उसकी रीढ़ को तोड़ा। लेबनान की सीमा पर जो चल रहा है, वह किसी भी तरह से इज़राइल की सैन्य विफलता नहीं है। यह एक बहु-प्रचारित, लेकिन सैन्य रूप से खोखली रणनीति है जो केवल अखबारों के पहले पन्ने पर जिंदा है, युद्ध के मैदान में नहीं।

अगली बार जब आप कोई ऐसी हेडलाइन देखें जो हिज़बुल्लाह के ड्रोन हमलों को एक बड़ी जीत की तरह पेश करे, तो समझ जाइएगा कि आप युद्ध की रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक पीआर कैंपेन का हिस्सा देख रहे हैं। असली सैन्य ताकत शोर नहीं मचाती; वह चुपचाप रणनीतिक लक्ष्यों को साफ करती है। और इस मोर्चे पर, हेडलाइंस के विपरीत, पलड़ा किसका भारी है, यह किसी से छिपा नहीं है।

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Amelia Miller

Amelia Miller has built a reputation for clear, engaging writing that transforms complex subjects into stories readers can connect with and understand.